Monday, February 16, 2026

 ( तेरी मेरी उसकी बात- 1 )


गोद से पहले गैलरी में !


आजकल बच्चे के जन्म से पहले ही उसकी डिजिटल कुंडली बन जाती है,अल्ट्रासाउंड से लेकर गोद में आने तक और गोद में आने से पहले ही व्हाट्सऐप,फेसबुक, इंस्टाग्राम पर उसका चेहरा टांग दिया जाता है.जैसे वह कोई मनुष्य नहीं,बल्कि स्टेटस अपडेट हो.


पैदा होते ही बच्चा सबसे पहले माँ की गोद में नहीं, बल्कि कैमरे के फ्रेम में आता है.उसकी पहली पहचान अब नाम नहीं,पोस्ट बन गई है.हम कहते हैं कि यह हमारी खुशी है,गर्व है,प्यार है.लेकिन क्या सच में?


असल सवाल यह है कि जिस बच्चे ने अभी रोना भी ठीक से नहीं सीखा,क्या उसने हमें अपनी तस्वीरें दुनिया के सामने रखने की अनुमति दी है? नहीं,उसकी कोई सहमति नहीं है,लेकिन उसकी निजता हम पहले दिन ही गिरवी रख देते हैं.


हम भूल जाते हैं कि यह तस्वीरें सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रहतीं.वे कंपनियों के सर्वर पर जाती हैं,एल्गोरिदम के पेट में उतरती हैं और एक दिन किसी अजनबी की स्क्रीन पर मनोरंजन बन जाती हैं.


जिस बच्चे को हम अपना कहते हैं,उसे हम बिना पूछे सार्वजनिक संपत्ति बना देते हैं.यह कैसी विडंबना है?

हम निजता की बात करते हैं,आधार,डेटा,सर्विलांस पर भाषण देते हैं,लेकिन अपने ही बच्चे की निजी दुनिया पर सबसे पहले हम ही हमला करते हैं.


कभी सोचिए,जब वह बच्चा बड़ा होगा और उसे पता चलेगा कि उसकी हर मुस्कान,हर मासूमियत इंटरनेट पर तैर रही है,तो वह क्या महसूस करेगा? क्या वह कहेगा कि धन्यवाद,आपने मुझे फेमस बना दिया या वह सोचेगा कि मेरी इजाजत के बिना मेरी ज़िंदगी क्यों बाँटी गई?


दरअसल,यह सिर्फ फोटो डालने का मामला नहीं है,

यह सत्ता का सवाल है.बड़े लोग,छोटों पर अधिकार जमाते हैं.जैसे वर्चस्वशाली समाज दलितों पर जमाता है,जैसे पुरुष स्त्रियों पर जमाता है,वैसे ही माता पिता बच्चों पर डिजिटल कब्जा कर लेते हैं.


हम कहते हैं कि हम तो इसके माँ-बाप हैं.हाँ,आप हैं.

लेकिन मालिक नहीं हैं.बच्चा आपकी संतान है,संपत्ति नहीं,एक स्वतंत्र मनुष्य है.भविष्य का नागरिक है.उसे अपनी पहचान खुद गढ़ने का हक है.


ऐसी भी क्या जल्दी है?सोशल मीडिया कहीं भागा नहीं जा रहा ! फेसबुक,इंस्टाग्राम आपके बच्चे से पहले भी थे और उसके बड़े होने तक भी रहेंगे.जब वह खुद चाहे,खुद तय करे कि कौन-सी तस्वीर,किसके साथ,किस दुनिया में डालनी है.तब वह ज्यादा सम्मानजनक होगा.


आज जिसे हम प्यार समझ रहे हैं,कहीं वह भविष्य में जबरदस्ती न साबित हो जाए.इसलिए,बच्चे को पहले इंसान बनने दीजिए,यूज़र नहीं.पहले उसे अपनी दुनिया जीने दीजिए,फिर डिजिटल दुनिया में उतरने दीजिए.क्योंकि असली परवरिश पोस्ट से नहीं,संवेदनशीलता से होती है.मासूम बचपन को गोद से पहले गैलरी में मत धकेलिए.


- भंवर मेघवंशी 

( लेखक एवं मानव अधिकार कार्यकर्ता )

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